Friday, November 29, 2024

अछूत कौन?


महेश चन्द्र रस्तोगी द्वारा लिखित कहानी

लेखक की ओर से

ये कहानी मैंने 1977 में, जब मैं कॉलेज में पढ़ता था, अपने कॉलेज की वार्षिक मैगजीन के लिये एक लेखन प्रतियोगिता के तहत लिख कर दी थी। इस रचना के लिये कॉलेज की ओर से मुझे प्रथम पुरस्कार के रूप में विमल मित्र का एक उपन्यास "कन्यापक्ष" प्राप्त हुआ था ।
इस कहानी के साथ एक चित्र जो कि ऊपर दिया है, उसके चित्रकार को मैं नहीं जानता क्योंकि ये कहानी जब मैगजीन में प्रकाशित हुई तो चित्र उसके साथ था। उस महान चित्रकार को मेरा नमन् । मेरी कहानी को यह चित्र बिना कुछ कहे ही पूरा कह जाता है ।
प्रस्तुत है शब्दशः वही रचना।
-----लेखक

अछूत कौन ?

--- द्वारा महेश चन्द्र रस्तोगी 

           कहीं एक शहर, शहर से सटी एक वाल्मिकी बस्ती । जो कभी मुख्य बसाहट से बहुत दूर रही होगी, आज वही शहर उससे कन्धा सटाये खड़ा था। जो कभी अबला नारी की तरह अपने ही आँचल में लिपटी सिमटी सिमटी सी और सहमी-सहमी सी रहती थी। आज उन्नत और सबला नारी की तरह सिर उठाये खड़ी है। इसी बस्ती का एक लड़का जिसका नाम 'केवल' है, एम•ए•अर्थशास्त्र का छात्र है । इस बस्ती पर छाया हुआ अशिक्षा का अंधकार प्रातः के रेशमी उजाले में बदल चुका है ।

'केवल' के घर के आँगन में कुर्सियाँ पड़ी हुई हैं । मध्य में दो मेजें पड़ी हैं जिन पर मेजपोश बिछे हैं ।लेकिन कुर्सियाँ बिना गद्दी की हैं । केवल विद्यालय से लौट कर आता है। उसके साथ उसके सहपाठियों की टोली है। सम्मान के साथ सबको बैठाया गया । चायपान प्रारम्भ हुआ।इसके साथ गपशप भी चल रही थी। एक छात्र ने अपने साथी पर व्यंग्य कसते हुए कहा:-
"कहिये, मिस्टर अनिल शर्मा! पवित्र होने के लिये हरिद्वार तो नहीं जाना पड़ेगा !"
इस पर सब ठहाका मार कर हँस पड़े ।अचानक ही नमकीन की तश्तरियाँ लिये हुए केवल आ धमकाऔर उसने भी यह वाक्य सुन लिया, लेकिन वह हँस न सका क्योंकि उसे ऐसा लगा कि यह उसकी जाति पर किया गया व्यंग्य है। यद्यपि उस छात्र का उद्देश्य शर्मा से छेड़खानी करना मात्र था। शर्मा ने भी उचित उत्तर दिया:-
"मुझे तो नहीं, हाँ तुम्हें अपना मन पवित्र करने के लिए हरिद्वार अवश्य जाना पड़ेगा ।"
"क्यों भई क्यों?" पहले वाला बोला ।
"इसलिए कि ऐसी भावना तुम्हारे मन में क्यों आई? ऐसा लगता है तुम्हें अपने अपवित्र हो जाने का भय हो रहा है।"

इस पर सब लोग फिर हँस पड़े ।गपशप और चायपान चलता रहा।चायपान समाप्त हुआ किन्तु गपशप कुछ देर बाद तक चलती रही । चलते समय शर्मा ने एक गिलास में पानी माँगा । काँच के गिलास में स्वच्छ पानी आ गया ।शर्मा एक ही साँस में सारा पानी पी गया।घर से बाहर आकर उसने एक वृद्ध को दूसरे व्यक्ति से कहते सुना-

"कभी लोग हमारी परछाईं से भी दूर भागा करते थे, किन्तु आज हमारे साथ खाते पीते हैं । अब हम अछूत नहीं रहे ।"

सभी लोग केवल के घर से विदा होकर अपने-अपने घर चले गये ।
दूसरे दिन विद्यालय के मैदान में अनिल शर्मा,  केवल आदि बैठे हुए जाड़ों की नर्म धूप का आनंद ले रहे थे ।सब लोग अनिल से आग्रह कर रहे थेकि वह उन्हें अपनी लिखी हुई कोई ताजा कहानी सुनाये। अनिल कह रहा था____

"मैंने कहानी लिखी है लेकिन अधूरी है।"

"आज तो अधूरी ही सुनने को मन कर रहा है ।"

"तो सुनो, एक खण्डहर से पड़े हुए मकान का दृश्य है । उस मकान में रहने के योग्य केवल एक कोठरी है । वह भी सीलन से भरी, दुर्गन्धयुक्त । उसमें एक टूटी सी चारपाई पर लगभग पैंतालीस वर्ष की स्त्री पड़ी हुई पेट के दर्द से कराह रही है। रात के तीसरे पहर का समय है ।जाड़े का मौसम है। एक गूदड़ सी रजाई से वह अपना तन ढाँके हुए है। आँखों के नीचे के काले गड्ढे गहरे हो गये हैं । उसका कुछ वृद्ध सा पति उसके सिरहाने की तरफ जमीन पर बैठा है। मिट्टी के तेल की जलती हुई कुप्पी मरियल सा पीला प्रकाश  फैला रही है। स्त्री कराहते हुए , अपने पति से कहती है ---

"मुझे डाक्टर को दिखा दीजिए, मैं दर्द से मरी जा रही हूँ,  आह!"

पति चुपचाप बेबस सा बैठा हुआ हाथ मलता रहता है। वह स्वयं ठंड से काँप रहा है। उसने शरीर पर तमाम गूदड़ कपड़े लपेट रखे हैं । लेकिन ठंड उसकी हड्डियों को छेदती हुई पार निकल जा रही है। उसे फिर पत्नी की कराहट एवं दर्द भरी आवाज सुनाई देती है ----

"मैं मर जाऊँगी!आह !••••हक ••••अक••••देखो मेरी साँस अटक रही है।"

इसके साथ ही वह हाँफने लगी। कराहते कराहते उसका गला खुश्क हो गया।

"सन्तोष करो पार्वती! सुबह हो जाने दो।"

"सुबह कब होगी?"

"बस थोड़ी ही देर बाकी है।"

"नहीं  सुबह कभी नहीं होगी, कभी नहीं!"

"होगी पार्वती,  हमारी भी सुबह होगी!", रोते हुए उसके पति ने कहा।
"मेरी जान निकली जा रही है, मुझे बचाओ मेरे स्वामी!"
"नहीं  नहीं ऐसा मत कहो पार्वती!"

"मुझसे दर्द अब सहा नहीं जाता । मुझे सरकारी अस्पताल ले चलो, वहाँ पैसे नहीं लगेंगे । जाकर रिक्शा ले आओ न!"

"मेरे पास तो रिक्शे तक के पैसे नहीं हैं पार्वती! मैं क्या करूँ?"
"मेरे पैरों में चाँदी के बिछुवे पड़े हैं,  उन्हें निकाल लो और किसी से थोड़े से पैसे ले आओ।"
"इनकी कीमत ही क्या है पार्वती! कौन देगा इनके बदले पैसे?"
"आ••ऽ ऽ ऽ ह!" दर्द से पार्वती चीख पड़ी । उसका पति भयभीत हो उठा। उसने पार्वती के पैरों से बिछुवे निकाले और उससे कहा
"मैं अभी आता हूँ पार्वती,  धीरज रखना!" और वह चला गया,
"फिर क्या हुआ?" केवल बीच में बोल पड़ा,
"पता नहीं ", अनिल ने उत्तर दिया
"क्या?" सब एक साथ आश्चर्य से बोल उठे,
"मैंने कहा था न कि कहानी अधूरी है!"
"ओह, मजा किरकिरा हो गया ।"
"आओ तुम्हें इस कहानी के पुरुष पात्र से मिला लाऊँ ।" अनिल ने कहा ।
"क्या कहा?" सब फिर आश्चर्य से बोले।
"हाँ! बाकी कहानी उसी के मुँह से सुन लेना।"

और सब लोग चलने के लिए तैयार हो गये ।रास्ते में उन्होंने भुने चने खरीदेऔर उन्हें टूँगते हुए चलने लगे।मार्ग में उन्हें प्यास लगी। सड़क के एक ओर लगी हुई टंकी से पानी अविरल गति से बह रहा था। सोचा कि पानी यहीं पी लिया जाये परन्तु अनिल ने मना करते हुए कहा---

"घर आ ही चुका है ।आओ वहीं गिलास लेकर पी लेंगे । यहाँ कपड़े भीग जायेंगे ।"
और सब उस खण्डहर से मकान में आ पहुँचे ।आँगन में फैली धूप चारपाई डाले वह बूढ़ा व्यक्ति बैठा हुआ था ।कमर के नीचे मर्दानी पीले रंग की मैली सी धोती बँधी थी।ऊपर से नंगा था।सीने की हड्डियों का उभार काले चमड़े में से स्पष्ट दीख रहा था।उस पर सफेद जनेऊ गले में पड़ा था। वह बेहद उदास था। अनिल ने उसे देख कर कहा---

"चाचा जी ! प्यास लगी है, पानी मिलेगा ?"

"हाँ हाँ बेटा क्यों नहीं, बैठो।" वह चारपाई पर से उठते हुए बोला,और अंदर कमरे में जाकर एक अल्युमिनियम का छोटा सा गिलास लेकर आया जो जगह जगह से पिचका हुआ था ।नीचे से कुछ काला हो रहा था ।शायद उसमें पानी गर्म किया होगा । पानी से भरा घड़ा आँगन में  ही रखा हुआ था। गिलास से ही धरती की थोड़ी मिट्टी खुरच कर उसने गिलास माँजा। घड़े के पानी से ही गिलास धोकर उसमें पानी भर अनिल को थमा दिया ।

"लो बेटा,  पियो।"

अनिल ने गिलास हाथ में लेकर अपने मित्र  राजीव की ओर देख कर कहा---
"लो, पियो, राजीव ।"
राजीव हिचकिचा रहा था। कभी गिलास को देख रहा था, कभी अनिल को। अनिल ने फिर टोका ---
"लो पियो ।"
"मुझे प्यास नहीं है।", राजीव ने कहा ।
"ओह!", अनिल ने साँस भरकर दूसरे छात्र की तरफ देखा और पूछा,
"तुम पियोगे??"
दूसरा छात्र एकदम हड़बड़ा गया। जल्दी जल्दी में वह बोला ,
"मैं,  मैं  पी चुका हूँ ।"

अनिल ने बारी-बारी से सबकी  तरफ देखा । सब निगाह चुराने की कोशिश कर रहे थे। केवल पर आकर उसकी दृष्टि ठहर गयी  जो पहले से ही मुँह फेर कर खड़ा हो गया था । अनिल के मुख पर बरबस मुस्कान खेल उठी। वह सोचने लगा ----

'मेरा प्रयोग सही निकला । आज एक ब्राह्मण को अछूत समझा जा रहा है।' केवल भी मुँह फेर कर खड़ा हो गया है ।अछूत कौन है? केवल  या यह ब्राह्मण! नहीं,  दोनों में से कोई नहीं । अछूत वही है जो दरिद्र है ।यदि अस्पृश्यता दूर करनी है तो गरीबी दूर करनी होगी । नहीं तो अस्पृश्यता एक वर्ग से हटकर दूसरे वर्ग पर छा जायेगी ।

"पानी तुमने भी नहीं पिया ।" उस व्यक्ति की आवाज़ ने अनिल को विचारों से जगा दिया । पलट कर अनिल ने उस व्यक्ति की ओर देखा । उस व्यक्ति ने देखा कि अनिल मुस्कुरा रहा है। उसके होंठ कुछ कुछ भीगे हुए हैं । गिलास खाली है ।

================समाप्त ============




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